Thursday, April 29, 2010

मैं क्या करूँ?-2

मैं क्या करूँ?-2

हम दोनों आमने सामने ही खड़ी थी, जिमी ने बीच में वह डंडा फंसा कर उसका एक भाग अपनी चूत पर लगा कर और दूसरा मेरी चूत से सटा दिया। यह नज़ारा बहुत ही रोमांटिक था, हम दोनों ने अपनी अपनी पोजीशन संभाल ली और एक दूसरे की चूचियाँ मसलते हुए अपनी कमर आगे झटकी, डंडे के दोनों सिरे हमारी आँखों से ओझल हो गए, मेरी उत्तेजना का कोई ठिकाना नहीं था, बस इसी तरह हम धीरे धीरे आगे बढ़ते गए और डंडा लुप्त होता गया, कुछ देर में हम दोनों के शरीर आपस में भिड़ गए। जिमी का अंदाजा सही था, ठीक 6-6 इंच ही हम दोनों के हिस्से आया था, एक अजीब सी मस्ती हम दोनों पर छा गई, हम एक दूसरे की चूची मसलते हुए होंठ चूमने लगी, तभी दरवाजे पर आहट हुई।

"लगता है बाबूलाल आ गया !" मैंने खुश होकर कहा।

"हां आहट तो उसी कमीने की है !" कहते हुए जिमी ने एक झटके के साथ मुझे अपने शरीर से जुदा कर दिया, डंडा फिसलता हुआ मेरी चूत से बाहर हो गया मगर जिमी की चूत मे आधा वैसे ही फंसा था, मेरी आंखे फटी रह गई क्योंकि वह डंडा जिमी के शरीर का ही अंग लग रहा था, जिमी उसी हालत में अपनी चुचियाँ हिलाती हुई दरवाजे की तरफ बढ़ी. जैसे ही दरवाजा खुला बाबूलाल लड़खडाता हुआ अंदर आ गया, उसकी आँखें सीधी उस डंडे पर जा टिकी,"ऐसा लग रहा है यह तुम्हारा ही सामान है मैडम !" उसकी बात सुन कर मुझे हंसी आ गई।

"अब जमाना आ गया है जब औरतों को डंडे लगवाने पड़ेंगे और तुम मर्दों को झुक कर खाने पड़ेंगे।" जिमी ने दरवाजा बंद करते हुए कहा।

"छोड़ो मैडम, यह जमाना अभी बहुत दूर है, आओ पहले तो हमी तुमको अपना डंडा खिलाते हैं।" उसने अपना पजामा उतार कर एक तरफ रखते हुए कहा।

"मैं तो बहुत बार खा चुकी हूँ, आज इसे खिलाना है, बेचारी बहुत दिनों से परेशान है।" जिमी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा।

वो जैसे ही मेरी तरफ घूमा मेरा दिल जोर से धड़क उठा, उस समय उसके लंड में हल्की-हल्की उत्तेजना थी लेकिन आकार वही था जो जिमी ने बताया था। यह आदमी है या गधा, मैं यह सोचने को मजबूर हो गई।

"यह हर परेशानी की दवा है मैडम !" उसने अपना लंड मुझे दिखाते हुए हिलाया,"अब यह आ गया है, सारी चिंता खत्म !"

"हूँ... .पहले ही काफी देर हो चुकी है, चलो काम पर लगो !" जिमी ने उसे मेरी तरफ धकेलते हुए कहा।

बाबूलाल एक ही झटके में मेरे पैरों पे आ गिरा, जिमी भी हंसती हुई मेरे पास आ खड़ी हुई, बाबूलाल औंधे मुंह गिरा था, जैसे ही उसने नजर उपर उठाई उसकी नजर सीधी मेरे चूत पर पड़ी," अरे.... बाप..... रे..... इसमें से तो भाप निकल रही है मैडम !" बाबूलाल चिल्लाया।

"क्या मतलब है तेरा?" जिमी ने अपने पैर से उसका सिर ऊपर उठाते हुए कहा।

"मतलब साफ है मैडम, इसकी गर्मी से तो मेरा लंड पिघल जाएगा।" वह हाथ झाड़ता हुआ खड़ा हुआ।

उसकी बात सुन कर मैं दंग रह गई, मैंने झुक कर अपनी चूत देखी मुझे तो कहीं भाप नहीं दिखी।

"क्या बक रहा है तू?" जिमी को गुस्सा आ गया, उसने बाबूलाल का लंड पकड़ कर इतनी जोर से झटका मारा कि बेचारा बाबूलाल दर्द से तड़प उठा,"मईया.......रे मैं तो जा रहा हूँ !" कह कर वो अपने कपड़े उठाने लगा।

उसे जाता देख मैं तो तड़प उठी,"हाय .....क्यों झगड़ा कर रही हो जिमी? वो जा रहा है !"

" अरे...मैं नहीं वो साला खुद झगड़ा कर रहा है, अगर भाप निकल रही है तो इसमे डरने की क्या बात है?"

"ज़रा उंगली डाल कर देखो, खुद पता चल जाएगा कि मैं क्यों डर रहा हूँ !"

"ठीक है इसका फैसला अभी हो जाता है !" जिमी ने बाबूलाल की तरफ देख कर दांत भींचे,"अगर तू यहाँ से भागा तो तेरी मूंछे उखाड़ कर तेरे पीछे घुसेड़ दूंगी !" कहते हुए वो उसी कमरे में गई जहाँ से वो डंडा उठा कर लाई थी जो अब तक उसकी चूत में आधा फंसा हुआ था।

जब वह लौटी तो उसके हाथ में थर्मामीटर था जिससे डॉक्टर बुखार देखते हैं, जिमी ने मुझे बैठा कर मेरी जांघें फैलाई और थर्मामीटर मेरी चूत में आधा फंसा दिया, बाबूलाल भी आँखे फाड़े हुए सामने खड़ा हो गया, तभी एक अजीब बात हो गई, थर्मामीटर मेरी चूत से बाहर उछला और उसके टुकड़े टुकड़े हो गए, हम तीनों की आंखें फटी रह गई।

" देख.....क्या हाल हुआ है थर्मामीटर का ! यही हाल इसका होने वाला था !" बाबूलाल ने अपनी मोटे लंड की तरफ इशारा किया।

"ओह्ह्ह ....अब मेरा क्या होगा जिमी, मैं तो आज बड़ी आशा लेकर यहाँ आई थी यार !" मैंने तड़प कर कहा।

"मैंने तुझसे पहले ही कहा था पायल, यह पागल कुतिया की तरह लार टपका रही है।"

"अब मैं क्या करूँ? कुछ सोच यार, नहीं तो मैं रो पडूँगी !"

"नहीं...."वो मेरा कन्धा पकड़ते हुए बोली,"आज तुझे नहीं इस पगली को रोना पड़ेगा, इसके आंसू निकलवाना बहुत जरुरी हो गया है।"

उसने बाबूलाल की तरफ देख कर कहा,"क्या बोलता है तू?"

"एक गाँधी का नोट और लगेगा मैडम !" बाबूलाल बोला।

जिमी को गुस्सा आ गया। वो कुछ करती उससे पहले मैंने जिमी से कहा- तुम पैसे दे दो।

"ठीक है बेटा ले ले तू पैसे, आज मैं भी तुझसे एक एक पैसे का हिसाब लेकर ही रहूंगी।"जिमी अपने पर्स से रूपए निकाल कर उसे देती हुई बोली।

"ठीक है.. ठीक है !" कहता हुआ वह मेरी जांघों के नीचे फर्श पर बैठता हुआ बोला। उसने एक बार कुत्ते की तरह मेरी चूत को सुंघा फ़िर लम्बी जीभ निकाल कर चाटने लगा, उसका स्पर्श बेहद उत्तेजक था। मैं बिन पानी की मछली की तरह छटपटाने लगी। जिमी मेरे पास बैठ गई, मेरी चूची दबाने लगी और होंठ और गाल चूमने लगी। फिर तो मैं आकाश में उड़ने लगी, मेरा अंग अंग झनझना उठा, मेरी चूत तड़पने लगी, वह मेरी चूत को हाथों से फैला कर चाट रहा था, जिमी ने मेरी चूचियां रगड़ डाली, वह उन पर उभरे निप्पल एक बच्चे की तरह चूसने लगी।

मैं मस्ती की वादियों में ऐसा खोई कि मैं अपना नाम पता तक भूल गई। पूरे बदन में मीठी मीठी गुदगुदी उठ रही थी जिसका अहसास मुझे पागल बना रहा था। मैंने भी कसमसा कर जिमी की छातियों को रगड़ डाला। उसने तड़प कर मेरे होंठ छोड़ दिये और मस्ती में कसमसा कर एक हाथ से डंडा हिलाने लगी जो बहुत देर से उसकी चूत में फंसा था। देखते ही देखते आधे से ज्यादा डंडा उसकी चूत में घुस गया था, वह फिर भी उस डंडे को बहुत जोर जोर से हिला रही थी।

"सी....ई......ई.....क्या कर रही है पागल, ऐसे तो ये डंडा टूट जाएगा यार !" मैंने उसके हाथों को पकड़ते हुए कहा।

"हूँ......हाँ...... छोड़ दे पायल, आज मैं इस डंडे को तोड़ कर ही दम लूंगी !" उसने मेरा हाथ झटक दिया।

वासना का नंगा नाच शुरू हो चुका था, बाबूलाल ने मेरी चूत चाट चाट कर बहुत सारा रस निकाल दिया था, अब मुझे वहां कुछ ठंडक सी महसूस हो रही थी। अब मैं चूत चटवाने से ऊब गई थी और बाबूलाल को वहाँ से हटा दिया, जब वह खड़ा हुआ तो उसका चेहरा देखने लायक था, उसके होंठ चिपचिपा रहे थे, उसकी मूंछें चूत के रस से भीग कर अकड़ गई थी।

"हाँ... .जी.. अब जरा इसका भी खयाल कर लो !" वह अपने होंठ चाटता हुआ और अपना विकराल लंड हिलाता हुआ बोला।

"अरे...इसे कौन छोड़ने वाला है !" यह कह कर जिमी बेड से कूद गई, उसने इशारे से मुझे भी बुला लिया, मेरे होंठ तो पहले ही फड़फड़ा रहे थे क्योंकि मैंने तीन साल बाद लंड के दर्शन किये थे, हम दोनों पास पास बैठ गई और बाबूलाल का लंड बारी बारी से चाटने लगी। मैं तो उसे अपने होंठ में दबा कर यह भी भूल जाती कि उसे छोड़ना भी है। जिमी जबरदस्ती खींच कर मेरे मुंह से निकालती।पुच्च......पुच्च.....की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी, बाबूलाल भी खुल कर मैदान में आ गया। वह लंड चुसाई का भरपूर आनन्द उठा रहा था, 10 मिनट बाद वह बोला,"बस करो मैडम, अब इसे छोड़ दो, इस पर रहम करो तो अच्छा है।"

मैं भी अब यही चाहती थी कि जल्द से जल्द चुदाई-लीला शुरु हो जानी चाहिए।

मैंने फर्श पर हथेलियाँ टिकाई और घुटने मोड़ कर एक पशु की तरह झुक गई, बाबूलाल मेरी गांड के पीछे आ खड़ा हुआ, वो अपने लंड के सुपाड़े को मेरी गांड और चूत पर रगड़ने लगा, हम दोनों की चुसाई के कारण उसका लंड एकदम चिकना हो रखा था, चूत पर लंड रगड़ने से मेरी चूत से भी चिकना रस निकलने लगा, तभी उसने एक झटका मारा कि उसका लंड मेरी चूत के छोटे से द्वार में आ फंसा, ऐसा झटका लगा कि मैं उछल पड़ी।

मैंने बाबूलाल से कहा,"अरे.....भैया, थोड़ा धीरे पेलो ! यह जिमी की चालू मशीन नहीं है जिसमें रोज तेल जाता है, यह मशीन तीन साल से बन्द है, पहले इसे ढीला कर लो फिर जैसे मर्जी हो चलाना।" मैंने कराहते हुए कहा।

"मैडम जी, आप की सहेली मुझे भैया कह रही है ?" बाबूलाल अपना लंड आगे पेलते हुए बोला।

"तुझे भैया बोल रही है तो तू बन जा इसका सैयां ! इसकी चूत में ऐसा लंड पेल कि हरामजादी चुदवाना भूल जाये, साली को बहुत खुजली होती है ! मिटा दे सारी खुजली।" जिमी ने उसे और जोश में लाने के लिए बोला।

अब तो बाबूलाल बंदर की तरह उछलने लगा, उसका लंड मेरी चूत की गहराई में उतर कर ऐसी तैसी कर रहा था, ऐसी तैसी तो कर रहा था लेकिन मजा इतना आ रहा था कि उसका बयां मैं यहाँ नहीं कर सकती, मेरे शरीर के साथ साथ मेरी चूचियाँ भी हवा में झूल रही थी, मेरे मुंह से ऐसे शब्द फुट रहे थे," हूँ..........सा......आ........आ...... ..बाश...... बाबूलाल, सी...... ई.... सी..... ई....... बस ऊँ......... आह........ मुझे ऐसे ही झूले की तलाश थी रे....!"

बाबूलाल भी मेरी तरह पागल आदमी था, उसने तो मेरा एक एक पुर्जा खोल कर रख दिया, वह बुरी तरह हांफता हुआ मुझे मस्ती का झूला झुला रहा था, बेचारी जिमी सामने बैठी अपनी चूत मे फंसा डंडा हिला रही थी, अचानक वह उठी और बाबूलाल के पीछे जा खड़ी हुई।

"ठहर जा बेटा !" उसने यह कह कर ढेर सारा थूक अपने डंडे पर लगाया और बाबूलाल की थिरकती गांड से सटा दिया,"मैं भी अभी तेरी ऐसी तैसी करती हूँ साले ...!"

"आ...आई.....मार ... दिया बेचारे पापड़ वाले को साली !"

बाबूलाल की दर्द भरी चीख सुन कर मुझे पूरा अंदाजा हो गया कि जिमी ने बाबूलाल के साथ क्या हरकत की है। यह तमाशा सारी रात चलता रहा।

पता नहीं उस बुड्ढे में क्या जादू है। हर रात मैं उसके पास खिंची चली आती हूँ, जिमी भी हमारे साथ होती है, अब मेरी जिन्दगी बड़े आराम से चुदवाते हुए गुजर रही है।

Sources : http://www.antarvasna.com/story.php?id=1215_office-me_mai-kya-karu-2

4 comments:

  1. भाभी के साथ होली
    मिला मौका मारा चौका
    शादी से पहले साली के साथ सुहागरात
    लण्ड और चूत दोनों को फायदा
    चुदी प्रियंका सारी रात
    प्रियंका के साथ एक रात की चुदाई
    पड़ोस की लड़की की कुँवारी चूत ली
    कुंवारी चूत चुदाई का आनन्दमयी खेल-1 (Bhanji Ki Kunvari Choot Chudai ka Khel-1)
    कुंवारी चूत चुदाई का आनन्दमयी खेल-2 (Bhanji Ki Kunvari Choot Chudai ka Khel-2)
    गाण्ड मेरी पटाखा बहन बानू की (Gaand Meri Patakha Bahan Banu ki)
    अन्तर्वासना सामने वाली खिड़की में
    Antarvasna सुहागरात का हसीन धोखा
    अन्धेरे में मिलन (Andhere Mein Milan)
    शास्त्री सिस्टर्स: अनुष्का ने मारा चौका (Shastri Sisters: Anushka ne Mara Chauka)
    मेरी सहयोगी ने मुझे ब्लैकमेल किया (Meri Sahyogi ne Mujhe Blackmail Kiya Sex Kiya)
    सऊदी मैडम की मोटी चिकनी जांघें (Saudi Madam ki Moti Chikni janghen)
    मेरी चुदाई की दास्तान – कार में चुदाई
    विज्ञान से चूत चुदाई ज्ञान तक (Vigyan se Choot Chudai Gyan)
    चूत के बलात्कार का चित्र (Choot ke Balatkar ka Chitra)
    नागपुर में मस्त भाभी की जबरदस्त चुदाई (Nagpur me Mast Bhabhi ki Jabardast Chudai)
    Antarvasna मेरी नाभि और उसकी जवानी (Meri Navi Aaur Uski Jabani)
    Antarvasna चूत चुदाई की प्रेम कहानी (Choot Chudai Ki Prem Kahani)

    ReplyDelete