Friday, July 30, 2010

प्यास से प्यार तक-2

प्यास से प्यार तक-2
प्रेषक : मानस गुरू

तभी से मैं श्रीजा को पाने के लिए योजना बनाने लगा। कुछ दिन बाद समीर कुछ काम से अपने घर चला गया। यही मेरे लिए सोने पे सुहागा जैसा था। तो मैंने श्रीजा को चोदने की सारी योजना पर अमल करने लगा।

उस दिन मैं सुबह के करीब नौ बजे ही कॉलेज पहुँच गया और श्रीजा के आने का इन्तजार करने लगा। लगातार उसकी स्कूटी की आवाज की तरफ कान खड़े हुए थे। जैसे ही उसकी स्कूटी की आवाज आई, मैं कॉलेज के लाइब्रेरी में उसका इन्तजार करने लगा क्योंकि वो कॉलेज आते ही हर रोज पहले लाइब्रेरी जाती थी।

जब वो लाइब्रेरी आई तो मैं जाकर उसकी मेज़ पर उसके आगे बैठ गया। वो हमेशा की तरह एक मोम की गुड़िया जैसी लग रही थी। उसके गहरे नीले टॉप से उसकी चूचियों के उभार बाहर झाँक रहे थे। उसकी खूबसूरती के आगे जैसे मेरे मुँह में ताला लग गया था।

फिर मैंने उससे पूछा," श्रीजा, क्या पढ़ रही हो ?"

" मैथ्स !"

" मुझे तो मैथ्स का कुछ भी नहीं आता, क्या तुम मुझे कुछ प्रोब्लम्स समझा दोगी, जिससे मैं पास हो जाऊं?"

" हाँ, समझा तो दूँगी, मगर कब और कहाँ ?"

" अरे तुम हॉस्टल में आकर मुझे समझा देना।"

" ठीक है, कल तो सन्डे है, मैं सुबह पहुँच जाउंगी, ओके !"

" थैन्क्स, तो मैं कल तुम्हारा इन्तजार करूँगा, ओके बाय !"

तब मैं हॉस्टल चला आया और श्रीजा को चोदने के ख्याल से ही बेचैन हो रहा था। मेरा लंड तभी से खड़ा हो गया था और रोंगटे खड़े होने लगे थे। मैंने रात जैसे- तैसे काटी।

सुबह-सुबह मैं बाजार गया और कंडोम ले कर आया। फिर नहा कर फ्रेश होकर श्रीजा का इन्तजार करने लगा। करीब नौ बजे मेरे कमरे के दरवाजे के दस्तक हुई। मैंने जाकर दरवाजा खोला तो श्रीजा को अपने आगे पाया जिसको चोदने के सपने मैं करीब एक महीने से देख रहा था और आज वो सपना पूरा होने जा रहा था। यही सोच के सारे बदन पर अजीब सी मस्ती छा रही थी।

आज श्रीजा दूसरे दिनों से कुछ ज्यादा ही खूबसूरत नजर आ रही थी। उस दिन उसने पीले रंग का सलवार-सूट पहन रखा था। उस पर काले रंग का दुपट्टा ! उसे देख कर मैं तो यह भी भूल गया कि उसे अन्दर भी बुलाना है। करीब दस सेकंड बाद मुझे पता चला और मैंने श्रीजा को अन्दर बुला लिया।

उसे कुर्सी पर बैठने को कहा। वो आराम से बैठ गई। फिर मैंने उसे चाय पानी पूछा। उसने मना कर दिया।

तब श्रीजा ने मेरी तरफ देखा और मैथ्स की किताब लाने को कहा। मैं मैथ्स की किताब ले आया तो वो मुझे कुछ प्रोब्लम्स समझाने लगी। करीब 15 मिनट बाद मैंने बोला," काफी बोरिंग है ये मैथ और मैंने जाकर लैपटॉप ऑन कर दिया और उसे लाकर टेबल पे श्रीजा के सामने रख दिया।

तब मैं श्रीजा से बोला,"आज मैं तुम्हें कुछ दिखने जा रहा हूँ !" और मैंने लैपटॉप पर वो फ़िल्म चला दी।

खुद को वीडियो में देख के श्रीजा भौंचक्की सी रह गई। फिर जब समीर ने उसके कपड़े उतारने शुरु किए तो उसका चेहरा लाल हो गया। उसने शर्म के मारे अपना हाथ अपने चेहरे पर रख दिया। कुछ देर बाद वो फूट फूट के रोने लगी। उसने मेरे पैर पकड़ लिए और रोते हुए बोली," देव, तुमने तो मुझे कहीं का नहीं छोड़ा, मेरे मम्मी पापा यह जान गए तो खुदकुशी कर लेंगे। ये तुम और किसी को मत दिखाना प्लीज़ ! तुम्हें हमारी दोस्ती की कसम !"

"दोस्ती है, तभी तो अब तक किसी को नहीं दिखाया, लेकिन अगर तुमने वो नहीं किया जो मैं चाहता हूँ तो कल तक यह वीडियो सारी दुनिया देखेगी।"

" क्या करना होगा मुझे? मैं कुछ भी करने के लिए तैयार हूँ !"

" तुम्हें मेरे साथ वही करना होगा, जो तुमने समीर के साथ इस वीडियो में किया है।"

" क्या? तुम इतने गिरे हुए इंसान हो, मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था !"

" मुझे और नीचे गिरने में ज्यादा देर नहीं लगेगी !"

तब श्रीजा कुछ देर खामोश रही जैसे पत्थर की मूरत बन गई हो और फिर मेरे बिस्तर पर आकर बैठ गई, अपना दुपट्टा नीचे गिरा कर बोली," कर लो जो करना है !"

मैं तो पूरा मज़ा लूटने के मूड में था, इसलिए बोल दिया," तुम्हें मेरा पूरा साथ देना होगा, जैसे तुमने समीर का साथ........."

तब मैं आगे बढ़ा और अपना हाथ श्रीजा के लबों पर रख दिया, वो फूल से कोमल तो थे लेकिन शोलों सी गर्मी थी उनमें !

मुझे लग रहा था जैसे वो रस के भंडार हैं और मैं उसकी बूँद बूँद पीने के लिए बेताब हुआ जा रहा था। फिर मैंने अपने लब उसके लबों पे रख दिए और धीरे धीरे लबों को काटने और चूसने लगा। मेरी और उसकी जबान टकराने लगी।

जैसा कि मैंने पहले ही उसे बोल दिया था, उसे भी साथ देना पड़ा। वो मेरे बालों को सहलाती जा रही थी।

फिर मैंने अपना दायाँ हाथ उसके भरे हुए सीने के ऊपर रख दिया तो वो जैसे चौंक सी गई। दूसरे हाथ से मैं उसकी पीठ सहलाता जा रहा था। मैं उसकी मदमस्त जवानी को पूरी तरह से अपने रोम-रोम में महसूस करना चाहता था।

कुछ देर बाद मैंने धीरे से उसका कमीज़ उतार दिया। अन्दर श्रीजा की चूचियों को एक काले रंग की ब्रा जकड़े हुए थी। उसके बोबे ब्रा के बंधन से छूटने के लिए उतावले मालूम पड़ रहे थे। मैं उन पहाड़ियों की कोमल और रेशमी दुनिया में खो जाना चाहता था।

लेकिन मैंने जल्दबाजी ना करते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ने का फ़ैसला किया।

मैंने फिर उसकी ब्रा के उपरी हिस्से से झांकती चूचियों को चूम लिया और चाटने लगा। फिर मैंने ब्रा के ऊपर से ही चूचियों को खूब मसला। श्रीजा की सिसकारियाँ छूटनी शुरु हो गई थी। वो ना चाहते हुए भी मेरी इस हरकतों से धीरे धीरे गर्म होने लगी थी।

मैंने श्रीजा के पूरे बदन को अपने लबों से छुआ। श्रीजा इससे मचलने लगी। उसके नाभि पर चुम्बन लिया तो जैसा पूरे बदन में कंपकंपी सी दौड़ गई।

अब मैंने उसकी पहाड़ियों को आजाद करने का सोचा और उसकी ब्रा का हुक पीछे से खोल दिया। अब श्रीजा मेरे आगे आधी नंगी थी। उसकी जवानी मेरे आगे अंगडाई भर रही थी। उसके मोमे जैसे मुझे बुला बुला के बोल रहे हों," आओ, हमें अपने हाथों से पुचकारो, अपने होठों से दुलारो, और हमारा रस पी जाओ !"

मैं श्रीजा के दाईं चूची के चुचूक को चूसने लगा और बाईं को अपनी हाथ से पुचकारने लगा।

श्रीजा आँखें मूँद कर गहरी सांसें भर रही थी।

फिर मैंने अपना टी-शर्ट उतार दिया। मेरा बदन देख कर श्रीजा की आँखें जैसे फटी रह गई, क्योंकि मेरा बदन समीर से काफी ज्यादा कसा हुआ और मरदाना था।

फिर मैंने श्रीजा की पैंट उतार दी। अब उसके शरीर पर एक पैंटी ही बची थी।

उसकी टांगें जैसे किसी कारीगर की सालों की मेहनत के बाद बनी मूर्ति की भाँति लग रही थी, एक भी दाग या खराबी नहीं थी उनमें !

फिर मैं श्रीजा की टांगों को चूमता गया और श्रीजा सीसकारियाँ लेती रही।

मैंने अब अपनी पैंट भी उतार दी। मेरा लंड तो कब से खड़ा होकर अन्दर से पैंट फाड़ के बाहर आने को बेताब हो रहा था। पैंट खोलते ही लंड एक नुकीले चीज की तरह चड्डी को सामने धकेल रहा था, यह देख कर श्रीजा शरमा सी गई।

फिर मैं श्रीजा के पैंटी की तरफ बढ़ा और उसे उतारने लगा तो श्रीजा ने मेरे हाथ पकड़ लिए। लेकिन मैंने उसकी पैंटी को टांगों के रास्ते उतार दिया।

श्रीजा ने अपना चेहरा दोनों हाथों से ढक लिया।

मैंने जिसको ख्वाबों में इतनी बार चोदा था आज वो मेरे आगे पूर्ण नग्नावस्था में पड़ी थी और मुझे जन्नत की सैर कराने के लिए तैयार थी। उसकी दोनों टांगों के बीच तिकोने आकार में छोटे छोटे बालों का एक जंगल था और उसके नीचे थी दो गुलाबी पंखुड़ियाँ और उनके बीच जन्नत में दाखिल होने के लिए छोटा सा रास्ता ! उसे देखते ही मेरा मन जल्दी से जन्नत देखने को उतावला होने लगा। अब मैंने अपनी चड्डी उतार दी और मेरी सात इन्च का लंड तना हुआ खड़ा था। लंड को देखकर श्रीजा के चेहरे पर कुछ बेताबी और घबराहट के निशान नजर आने लगे क्योंकि समीर का लंड मेरे इतना न ही लंबा था और न ही मोटा।

मैं श्रीजा की जांघ की भीतरी चिकनी सतह को चाटता गया और श्रीजा के पूरे बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी।

अब मैं धीरे-धीरे श्रीजा के उस अंग के ओर बढ़ चला जो कि एक लड़की की सबसे अनमोल चीज़ होती है, मैं उसे आज लूट लेना चाहता था। उसकी चूत से मदहोश करने वाली गंध आ रही थी।

मैं धीरे धीरे आगे बढ़ा और चूत की एक पंखुड़ी को अपनी होंठों के बीच लेकर थोड़ा भींच लिया और श्रीजा जैसे तड़प सी उठी। मैंने दोनों पंखुड़ियों को कई बार ऐसा किया और हाथों से मसला भी। अब मैं श्रीजा की भग-कलि को मसलने लगा और श्रीजा और जोर जोर से मचलने लगी और सिसकारियाँ भरने लगी। उसकी चूत थोड़ा थोड़ा पानी छोड़ने लगी थी।

अब मैं समझ गया कि वो आखिरी पल आ गया है जिसका इन्तजार मैं इतने दिनों से कर रहा था। मैं आगे बढ़ा और मेरा पूरा शरीर श्रीजा के शरीर के ऊपर आ गया। उसके स्तन मेरी बालों भरी मरदाना छाती के नीचे दबे हुए थे। मैंने दोनों चूचियों को कुछ देर तक होंठों से चूसा।

अब श्रीजा की बेताबी चरम पर पहुँच चुकी थी। मैंने अब अपने लण्ड का सुपारा उसकी छोटी सी चूत के आगे रखा और धीरे धीरे अन्दर धकेलने देने लगा। श्रीजा थोड़ा चिल्लाई और मेरा सुपारा उसकी चूत के अन्दर था।

श्रीजा की चूत अन्दर से मक्खन की तरह चिकनी, नर्म और काफी गीली थी और काफी गर्म भी थी। मुझे जन्नत दिखाई देने लगी थी। अब बिना किसी कोशिश के ही धीरे-धीरे लंड चूत के अन्दर और अन्दर घुसता ही जा रहा था। कुछ देर बाद लंड और अन्दर नहीं गया तो मैंने थोड़ा जोर लगाया और श्रीजा दर्द से चीख उठी। मेरा लंड अब पूरा का पूरा श्रीजा के अन्दर था।

श्रीजा की चूत ने मेरे लंड को जकड़ रखा था। वो अनुभव शब्दों में बयान नहीं जा सकता। खुद का लंड किसी चूत में जाने से ही पता लग सकता है असली चूत का मज़ा।

अब मैं धीरे-धीरे लण्ड को को अन्दर-बाहर करने लगा। श्रीजा की चूत काफी गीली हो चुकी थी इसलिए लंड आसानी से अन्दर-बाहर हो रहा था। मैंने करीब दस मिनट तक श्रीजा को उसी तरह चोदा।

फिर मैंने उसे चौपाये की अवस्था में आने को कहा और पीछे से उसके चूत में अपना लौड़ा डाला। इस अवस्था में और ज्यादा मज़ा आने लगा। बीच-बीच में मैं आगे झुक के उसके स्तनों को जकड़ लेता और श्रीजा सिसकार उठती। मैं उसके पीठ पर चुम्बन किए जा रहा था।

करीब 15 मिनट तक चोदने के बाद हम दोनों फिर से पहले वाली अवस्था में आ गये। अब मैं कंडोम ले आया शेल्फ से और पहन लिया। मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से श्रीजा को कोई मुसीबत झेलनी पड़े।

कंडोम पहनने के बाद मैंने फिर से मेरा लंड श्रीजा के चूत में डाला और पहले धीरे-धीरे, फिर जोर-जोर से चोदने लगा। श्रीजा भी अब अपनी मंजिल की तरफ बढ़ने लगी। करीब दस मिनट बाद मेरे लंड पर श्रीजा की चूत का दवाब अचानक बढ़ गया और श्रीजा निढाल हो गई।

मैंने अब भी जोर जोर से चोदना चालू रखा और कुछ देर बाद अपना सारा माल कंडोम के अन्दर गिरा दिया।

कुछ देर तक हम दोनों वैसे ही पड़े रहे बिस्तर पर !

हम दोनों पसीने से तर-बतर हो चुके थे। फिर मैंने धीरे से अपना लंड श्रीजा की चूत से निकाला, खड़ा हो गया, श्रीजा के होठों पर एक चुम्बन करके चला आया। मैंने कंडोम उतारा और बाथरूम चला गया।

कुछ देर बाद बाहर आया और श्रीजा को अन्दर जाने के लिए बोल दिया। श्रीजा अन्दर गई और नहा कर बाहर आई। अब मैंने अपने कपड़े पहन लिए थे। श्रीजाने भी अपने कपड़े पहन लिए। फिर श्रीजा मुझसे बिना कुछ कहे बाहर निकल गई।

उसके कुछ दिन बाद तक वो कॉलेज नहीं आई। मैं घबरा गया था, कहीं वो कुछ कर तो नहीं बैठी। फिर सात दिन बाद समीर लौट आया और श्रीजा भी कॉलेज आने लगी, लेकिन वो जब भी मुझे देखती उसका खिला सा चेहरा मुरझा जाता और उसमें नफरत साफ झलकती थी।

पहले कुछ दिन तो श्रीजा और समीर के बीच सब कुछ सामान्य था लेकिन समीर का मन अब श्रीजा से ऊब चुका था और वो एक नई लड़की के पीछे लग गया था।

श्रीजा को समीर का सब सचाई तब पता चली जब एक दिन उसने समीर को उस लड़की को चूमते हुए पकड़ लिया। अब वो काफी उदास रहने लगी और कॉलेज भी आना काफी कम कर दिया उसने।

एक दिन मैं शाम को नदी किनारे टहल रहा था कि अचानक कुछ पानी में गिरने की आवाज़ आई। मैंने देखा तो एक लड़की पानी में डूब रही थी। मैं क्यूंकि एक अच्छा तैराक हूँ, मैं भी पानी में कूदा और उस लड़की को किनारे तक लाया। मैं पानी में अंधेरे की वजह से उसका चेहरा नहीं देख पाया था। जब किनारे उसको लिटाया तो यह देख कर मेरी आँखें फटी की फटी रह गई कि वो कोई और नहीं बल्कि श्रीजा ही थी। पेट में पानी भर जाने से वो बेहोश थी।

मैंने उसे कुछ लोगों की मदद से पास के हस्पताल पहुँचाया। कुछ देर बाद श्रीजा को होश आया। मैं जब उसके सामने गया तो वो पहले चौंकी और अपना चेहरा फेर लिया। डॉक्टर साब ने तब बताया कि मैंने ही उसकी जान बचाई है और डॉक्टर साब बाहर चले गए।

तब श्रीजा ने मुझसे पूछा,"क्यूँ बचाया मुझे ? जिसको सब कुछ दे दिया वो तो हाथ छोड़ के चला गया, तो फिर जिंदगी का हाथ थामने से क्या फायदा !"

मैंने तब कहा,"समीर तो तुम्हारे प्यार के लायक था ही नहीं, लड़कियों के जिस्म से खेलना तो उसका शौक है और उस पर अपनी जिंदगी कुर्बान कर देना कोई समझदारी की बात नहीं ! तुम्हारे घर में और भी कई जिम्मेदारियाँ हैं जो तुम्हें निभानी हैं।"

मेरी बातें सुन कर वो कुछ हद तक सही हुई। करीब दो घंटे बाद डॉक्टर साब ने एक बार फिर चेकअप किया और डिस्चार्ज कर दिया। श्रीजा को मैंने ऑटो मैं बिठाया और उसके घर छोड़ दिया।

उसके दूसरे दिन से श्रीजा रोज कॉलेज आने लगी और मेरी और श्रीजा की अच्छी दोस्ती हो गई। अगले कुछ महीनो में दोस्ती प्यार में कैसे तबदील हो गई, ये हम दोनों में से किसी को पता भी नहीं चला।

आज मैं और श्रीजा एक ही कॉलेज में एम बी ए की पढ़ाई कर रहे हैं। श्रीजा एक गायिका बन चुकी है और उसकी कई सारी म्यूजिक ऐल्बम आ चुके हैं।

हम दोनों एक दूसरे को आज भी उतना ही प्यार करते हैं जितना की शुरुआत में करते थे, बल्कि धीरे-धीरे प्यार और गहरा हुआ है और श्रीजा और मैंने शादी करने का भी फ़ैसला किया है लेकिन अभी नहीं, कहीं अच्छी सी नौकरी लगने के बाद !!!

आशा है कि अन्तर्वासना डॉट कॉम पर प्रकाशित यह कहानी आपको अच्छी लगी होगी।

मुझे अपनी प्रतिक्रिया भेजें....

guru.manas@yahoo.co.in

3 comments:

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